सिख धर्म की कहानी
टाइमलाइन के साथ चलिए और 500 से ज़्यादा सालों के सिख इतिहास की सैर कीजिए!
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1469
गुरु नानक देव जी का जन्म
गुरु नानक देव जी का जन्म तलवंडी नाम के गाँव में हुआ, जिसे आज ननकाना साहिब कहते हैं और जो अब पाकिस्तान में है।
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उनके पिता मेहता कालू जी और माता तृप्ता जी थे, और उनकी बड़ी बहन बेबे नानकी जी थीं। बेबे नानकी जी ही सबसे पहले समझ गई थीं कि उनका भाई बहुत खास है।
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लगभग 1499
“न कोई हिंदू, न कोई मुसलमान”
वेईं नदी में स्नान करने के बाद गुरु नानक जी तीन दिन तक दिखाई नहीं दिए। जब वे लौटे तो उन्होंने कहा, “न कोई हिंदू, न कोई मुसलमान” — यानी ईश्वर के सामने हम सब बराबर हैं।
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यह घटना सुल्तानपुर लोधी में हुई। उनका संदेश था कि ईश्वर धर्म के नाम नहीं देखता, बल्कि यह देखता है कि हम कैसे जीते हैं और दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।
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1500–1524
लंबी यात्राएँ (उदासियाँ)
गुरु नानक जी ने अपने साथी भाई मरदाना के साथ हज़ारों मील पैदल यात्रा की और गीतों के ज़रिए अपना संदेश फैलाया।
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इन चार बड़ी यात्राओं को उदासियाँ कहते हैं। वे तिब्बत, श्रीलंका, बगदाद और मक्का जैसी दूर-दूर की जगहों तक गए। भाई मरदाना, जो मुसलमान थे, रबाब (एक तार वाला बाजा) बजाते थे और गुरु जी गाते थे।
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1539
गुरु की ज्योति आगे बढ़ी
ज्योति-जोत समाने से पहले गुरु नानक जी ने भाई लहणा को अगला गुरु चुना और उनका नाम गुरु अंगद रखा। यही एक ज्योति दस बार एक गुरु से दूसरे गुरु तक पहुँची।
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1570 का दशक
अमृतसर शहर की शुरुआत
गुरु राम दास जी ने एक पवित्र सरोवर के आसपास नया नगर बसाया। आगे चलकर यही अमृतसर शहर बना।
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1604
पवित्र ग्रंथ तैयार हुआ
गुरु अर्जन देव जी ने गुरुओं और दूसरे संतों की बाणी को एक ग्रंथ, आदि ग्रंथ, में इकट्ठा किया और उसे हरिमंदिर साहिब में स्थापित किया।
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1606
पहले सिख शहीद
गुरु अर्जन देव जी ने अपना धर्म छोड़ने के बजाय अपने प्राण दे दिए। उनके बेटे, गुरु हरगोबिंद जी, ने सिखों को संत और सिपाही दोनों बनना सिखाया।
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शहीद वह होता है जो सच्चाई के लिए अपनी जान दे देता है। गुरु हरगोबिंद जी दो तलवारें पहनते थे — मीरी (दुनियावी ताकत) और पीरी (आत्मिक ताकत) — और उन्होंने अकाल तख़्त बनवाया।
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1675
गुरु तेग बहादुर जी ने आज़ादी की रक्षा की
गुरु तेग बहादुर जी ने दिल्ली में अपने प्राण दे दिए, ताकि हर इंसान को अपना धर्म मानने का हक़ मिल सके।
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1699
खालसा का जन्म
वैसाखी के दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा बनाया — सिखों का एक परिवार, जो ईमानदारी, बहादुरी और दया से जीने का वचन देता है।
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पाँच बहादुर सिखों ने गुरु जी को अपना शीश भेंट किया। वे पंज प्यारे (पाँच प्यारे) कहलाए। उन्हें अमृत छकाया गया, और फिर गुरु जी ने उनसे खुद भी अमृत माँगा, यह दिखाने के लिए कि गुरु और खालसा बराबर हैं।
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1708
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी सदा के लिए गुरु बने
गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा कि उनके बाद कोई देहधारी गुरु नहीं होगा। पवित्र ग्रंथ, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, ही हमेशा के लिए गुरु होंगे।
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1709–1716
बंदा सिंह बहादुर
बंदा सिंह बहादुर ने सिखों की अगुवाई की, ज़मीन उन किसानों को दी जो उस पर मेहनत करते थे, और पंजाब में पहला सिख राज कायम किया।
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1716–1760 का दशक
कठिन समय और मिसलें
शासक सिखों के पीछे पड़े थे, पर सिख जंगलों और रेगिस्तानों में रहकर भी मज़बूत बने रहे। उन्होंने खुद को बारह दलों में बाँटा, जिन्हें मिसलें कहते हैं।
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सिख साल में दो बार अमृतसर में इकट्ठा होकर सरबत खालसा (पूरा खालसा) के रूप में मिलकर फ़ैसले करते थे। 1762 में एक हमले में हज़ारों सिख मारे गए, जिसे वड्डा घल्लूघारा (बड़ा नरसंहार) कहते हैं, फिर भी कुछ ही महीनों में सिख फिर से संभल गए।
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1799–1849
सिख साम्राज्य
महाराजा रणजीत सिंह ने मिसलों को एक किया और लाहौर को राजधानी बनाकर एक मज़बूत और न्यायपूर्ण साम्राज्य बनाया।
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1849
अंग्रेज़ों ने पंजाब ले लिया
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ दो युद्धों के बाद पंजाब ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गया।
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1897
सारागढ़ी की लड़ाई
21 सिख सैनिकों ने हज़ारों हमलावरों से एक छोटे किले की बहादुरी से रक्षा की। इसे इतिहास के सबसे बहादुर आख़िरी मोर्चों में से एक के रूप में याद किया जाता है।
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1914–1945
विश्व युद्ध
लाखों सिख सैनिकों ने पहले और दूसरे विश्व युद्ध में यूरोप, अफ़्रीका और एशिया में लड़ाई लड़ी।
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1947
बँटवारा
जब भारत और पाकिस्तान अलग-अलग देश बने, तो पंजाब दो हिस्सों में बँट गया। लाखों-करोड़ों लोगों को, जिनमें बहुत से सिख भी थे, अपना घर छोड़ना पड़ा।
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आज
दुनिया भर में सिख
आज लगभग 2.5–3 करोड़ सिख हैं, जो भारत, ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कई दूसरे देशों में रहते हैं।
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