मूल मंतर
अंग 1कहाँ से: जपुजी साहिब — श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के सबसे पहले शब्द · रचयिता गुरु नानक देव जी
ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
इसे कैसे बोलें: ikOankaar sat naam karataa purakh nirabhau niravair akaal moorat ajoonee saibha(n) gur prasaadh ||
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💡 हमारे लिए इसका अर्थ
मूल मंतर हमें बताता है कि ईश्वर कैसा है: ईश्वर एक ही है, जिसका नाम सत्य है। ईश्वर ने सब कुछ बनाया है, वह किसी से नहीं डरता और किसी से वैर नहीं करता, न कभी जन्म लेता है और न कभी मरता है — और गुरु की कृपा से ही हम ईश्वर को जान पाते हैं।
प्रकाशित अनुवाद
अकाल-पुरख एक है, जिसका नाम ‘अस्तित्व वाला’ है जो सृष्टि का रचनहार है, (करता है) जो सभ में व्यापक है, भय से रहित है (निर्भय), वैर से रहित है (निर्वेर), जिसका स्वरूप काल से परे है, (भाव, जिसका शरीर नाश-रहित है), जो यौनियों में नहीं आता, जिसका प्रकाश अपने आप से हुआ है और जो सत्गुरू की कृपा से मिलता है।