सिख साम्राज्य

50 सालों तक पंजाब पर सिख साम्राज्य का राज रहा। इसके महान नेता महाराजा रणजीत सिंह थे, जिन्हें शेर-ए-पंजाब — यानी पंजाब का शेर — कहा जाता है।

🦁 महाराजा रणजीत सिंह: एक नज़र में

जन्म
13 नवंबर 1780, गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में)
महाराजा बने
1801, 20 साल की उम्र में
राजधानी
लाहौर
उपनाम
शेर-ए-पंजाब (पंजाब का शेर)
देहांत
27 जून 1839, लाहौर

1. साम्राज्य से पहले: मिसलें

1700 के दशक में सिख बारह दलों में बँटे हुए थे, जिन्हें मिसलें कहते थे। हर मिसल का एक सरदार होता था। वे मिलकर पंजाब को हमलावरों से बचाते थे।

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मिसलें कभी-कभी आपस में झगड़ती भी थीं, पर खतरा आने पर वे दल खालसा (खालसा की सेना) बनकर एक हो जाती थीं। रणजीत सिंह का परिवार सुकरचकिया मिसल का मुखिया था।

2. एक बहादुर बच्चा

बचपन में रणजीत सिंह को चेचक हुई और उनकी बाईं आँख की रोशनी चली गई। पर उन्होंने इसे कभी अपने रास्ते की रुकावट नहीं बनने दिया। सिर्फ़ 10 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली लड़ाई लड़ी!

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जब रणजीत लगभग 12 साल के थे, तब उनके पिता महा सिंह का देहांत हो गया। उनकी माँ और उनकी सास, सदा कौर — जो एक समझदार और ताकतवर मिसल नेता थीं — ने युवा सरदार के रूप में उनका मार्गदर्शन किया।

3. लाहौर पर कब्ज़ा

1799 में, जब वे सिर्फ़ 19 साल के थे, रणजीत सिंह ने लाहौर के बड़े शहर पर कब्ज़ा किया। 1801 में उन्हें पंजाब का महाराजा (महान राजा) घोषित किया गया।

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फिर उन्होंने सारी मिसलों को मिलाकर एक राज्य बनाया। सालों में उनका साम्राज्य बढ़ता गया और इसमें मुल्तान, कश्मीर और पेशावर भी शामिल हो गए। यह ख़ैबर दर्रे से लेकर तिब्बत के पहाड़ों तक फैला था।

4. एक न्यायप्रिय शासक

रणजीत सिंह सभी धर्मों के लोगों के साथ बराबरी का व्यवहार करते थे। उनके बड़े मंत्रियों और सेनापतियों में सिख, हिंदू, मुसलमान और यहाँ तक कि यूरोपीय लोग भी थे।

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उनके विदेश मंत्री, फ़क़ीर अज़ीज़ुद्दीन, मुसलमान थे, और उनके वित्त मंत्री, दीवान दीना नाथ, हिंदू थे। वे शायद ही कभी मौत की सज़ा देते थे। वे किसी शानदार सिंहासन पर नहीं बैठते थे और अपनी सरकार को अपने नाम से नहीं, बल्कि सरकार-ए-खालसा (खालसा की सरकार) कहते थे। उनके सिक्के गुरु नानक जी और गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम पर जारी होते थे।

5. एक ताकतवर सेना

उन्होंने एशिया की सबसे मज़बूत सेनाओं में से एक बनाई, जिसे फ़ौज-ए-ख़ास कहते थे। उनके सबसे महान सेनापतियों में से एक थे हरि सिंह नलवा, जो इतने बहादुर थे कि कहते हैं उन्होंने एक बाघ से लड़ाई की थी।

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उन्होंने अपने सैनिकों को आधुनिक तरीकों से प्रशिक्षण देने के लिए ज़ाँ-बैप्टिस्ट वेंतूरा और ज़ाँ-फ़्रांस्वा अलार्ड जैसे अनुभवी यूरोपीय अफ़सरों को रखा।

6. श्री दरबार साहिब पर सोना

महाराजा रणजीत सिंह ने हरिमंदिर साहिब की ऊपरी मंज़िलों पर सोना और संगमरमर लगवाया। इसीलिए अंग्रेज़ी में इसे “Golden Temple” कहते हैं!

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उन्होंने हिंदू मंदिरों को भी सोना दिया, जैसे वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, और मस्जिदों को भी भेंट दीं — इससे पता चलता है कि वे सभी धर्मों का आदर करते थे।

7. कोहिनूर हीरा

महाराजा के पास कोहिनूर (“रोशनी का पहाड़”) था, जो दुनिया के सबसे बड़े हीरों में से एक है। वे इसे अपनी बाँह पर पहनते थे।

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साम्राज्य खत्म होने के बाद अंग्रेज़ यह हीरा ले गए और इसे महारानी विक्टोरिया को दे दिया गया। आज यह ब्रिटिश राजमुकुट के रत्नों (क्राउन ज्वेल्स) का हिस्सा है।

8. साम्राज्य का अंत

1839 में रणजीत सिंह के देहांत के बाद इस बात पर झगड़े हुए कि राज कौन करेगा। अंग्रेज़ों ने सिखों के ख़िलाफ़ दो युद्ध लड़े, और 1849 में पंजाब पर कब्ज़ा कर लिया।

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आख़िरी महाराजा, दलीप सिंह, सिर्फ़ 10 साल के थे। उन्हें उनकी माँ, महारानी जिंद कौर, से अलग करके इंग्लैंड भेज दिया गया। उनकी बेटी, राजकुमारी सोफ़िया दलीप सिंह, आगे चलकर ब्रिटेन में महिलाओं के वोट देने के हक़ के लिए लड़ने वाली एक मशहूर कार्यकर्ता बनीं।

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1. महाराजा रणजीत सिंह को क्या कहा जाता था?

2. सिख साम्राज्य की राजधानी कौन सा शहर था?