श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी सिखों का पवित्र ग्रंथ है। पर यह सिर्फ़ एक किताब नहीं है — सिख इसे जीवित गुरु मानते हैं, ग्यारहवें और सदा रहने वाले गुरु।
इसमें छह सिख गुरुओं के, और हिंदू व मुसलमान संतों के भी, लिखे शबद (जिन्हें गुरबाणी कहते हैं) हैं। इससे पता चलता है कि ईश्वर के बारे में ज्ञान किसी से भी मिल सकता है।
ये शबद संगीत में ढली कविताएँ हैं। इन्हें हारमोनियम और तबले जैसे बाजों के साथ गाया जाता है। इस गायन को कीर्तन कहते हैं।
यह गुरमुखी लिपि में लिखा है, और इसमें कई भाषाओं का मेल है, जैसे पंजाबी, पुरानी हिंदी, फ़ारसी और संस्कृत।
सिख आदर कैसे दिखाते हैं
- इसे एक ऊँचे सिंहासन (तख़्त) पर चँदोवे के नीचे रखा जाता है, जैसे किसी राजा या रानी को।
- कोई व्यक्ति इसके ऊपर चौर साहिब (बालों से बना पंखा) झुलाता है, जो राजसी सम्मान की निशानी है।
- इसे सुंदर कपड़ों में लपेटा जाता है, जिन्हें रुमाले कहते हैं।
- रात को इसे “आराम” के लिए इसके अपने कमरे में ले जाया जाता है (सुखासन), और सुबह इसे फिर से खोला जाता है (प्रकाश)।
- इसके सामने लोग सिर ढकते हैं, जूते उतारते हैं, और कभी इसकी ओर पीठ नहीं करते।
इसमें 1,430 पन्ने हैं, जिन्हें अंग कहते हैं — मानो ये गुरु के शरीर का हिस्सा हों।
हर छपी हुई प्रति में ठीक उसी पन्ने पर ठीक वही शब्द होते हैं।
गुरुओं की बाणी 31 रागों (संगीत के भावों) में बँटी हुई है।
हर दिन बिना चुने कहीं से भी एक शबद पढ़ा जाता है, जिसे हुकमनामा कहते हैं — यह उस दिन के लिए गुरु का संदेश होता है।
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